Sunday, 22 April 2012

दादुर का दर्द


दादुर कहे आज उदर मे बड़ी उथल पुथल है,,,,,
पत्तों पे लेटा टमी थामे दादुर बड़ा व्याकुल है,,,,,,,,
नैना सातवे आसमान पर ख्यालों मे झूल है ,,,,,,,
तन-बदन,अंग-अंग सारा यौवन बड़ा शिथिल है,,,,,,
बदरिया गरजे आवाजों की शंक्नाद पल-पल है ,,,,,,
ऐसा प्रतीत हो रहा जैसे लूज़ मोशन की पहल है,,,,,,,,,,
करवटों पे करवटें जिंदगी बस जल-थल,जल-थल है ,,,,,,,,
हरा-भरा संसार हो रहा जैसे निगाहों मे धुल-धूमिल है ,,,,,,,,,,
प्राण पखेरू कब उड़ जाए जहनो-जिया मे बड़ी हलचल है ,,,,,,,,
साँसों को साँसों से लगता जैसे ट्रेफिक जाम की दखल है,,,,,,,,,
चहरे पे डर-खौफ,भय-भ्रम और कंगालों-सी शकल है ,,,,,,,,
कहे दादुर दीनहीन अब मौत ही मेरी बस मंजिल है,,,,,,,,,




दादुर का दर्द


दादुर कहे आज उदर मे बड़ी उथल पुथल है,,,,,
पत्तों पे लेटा टमी थामे दादुर बड़ा व्याकुल है,,,,,,,,
नैना सातवे आसमान पर ख्यालों मे झूल है ,,,,,,,
तन-बदन,अंग-अंग सारा यौवन बड़ा शिथिल है,,,,,,
बदरिया गरजे आवाजों की शंक्नाद पल-पल है ,,,,,,
ऐसा प्रतीत हो रहा जैसे लूज़ मोशन की पहल है,,,,,,,,,,
करवटों पे करवटें जिंदगी बस जल-थल,जल-थल है ,,,,,,,,
हरा-भरा संसार हो रहा जैसे निगाहों मे धुल-धूमिल है ,,,,,,,,,,
प्राण पखेरू कब उड़ जाए जहनो-जिया मे बड़ी हलचल है ,,,,,,,,
साँसों को साँसों से लगता जैसे ट्रेफिक जाम की दखल है,,,,,,,,,
चहरे पे डर-खौफ,भय-भ्रम और कंगालों-सी शकल है ,,,,,,,,
कहे दादुर दीनहीन अब मौत ही मेरी बस मंजिल है,,,,,,,,,




दादुर का दर्द


दादुर कहे आज उदर मे बड़ी उथल पुथल है,,,,,
पत्तों पे लेटा टमी थामे दादुर बड़ा व्याकुल है,,,,,,,,
नैना सातवे आसमान पर ख्यालों मे झूल है ,,,,,,,
तन-बदन,अंग-अंग सारा यौवन बड़ा शिथिल है,,,,,,
बदरिया गरजे आवाजों की शंक्नाद पल-पल है ,,,,,,
ऐसा प्रतीत हो रहा जैसे लूज़ मोशन की पहल है,,,,,,,,,,
करवटों पे करवटें जिंदगी बस जल-थल,जल-थल है ,,,,,,,,
हरा-भरा संसार हो रहा जैसे निगाहों मे धुल-धूमिल है ,,,,,,,,,,
प्राण पखेरू कब उड़ जाए जहनो-जिया मे बड़ी हलचल है ,,,,,,,,
साँसों को साँसों से लगता जैसे ट्रेफिक जाम की दखल है,,,,,,,,,
चहरे पे डर-खौफ,भय-भ्रम और कंगालों-सी शकल है ,,,,,,,,
कहे दादुर दीनहीन अब मौत ही मेरी बस मंजिल है,,,,,,,,,




दादुर का दर्द


दादुर कहे आज उदर मे बड़ी उथल पुथल है,,,,,
पत्तों पे लेटा टमी थामे दादुर बड़ा व्याकुल है,,,,,,,,
नैना सातवे आसमान पर ख्यालों मे झूल है ,,,,,,,
तन-बदन,अंग-अंग सारा यौवन बड़ा शिथिल है,,,,,,
बदरिया गरजे आवाजों की शंक्नाद पल-पल है ,,,,,,
ऐसा प्रतीत हो रहा जैसे लूज़ मोशन की पहल है,,,,,,,,,,
करवटों पे करवटें जिंदगी बस जल-थल,जल-थल है ,,,,,,,,
हरा-भरा संसार हो रहा जैसे निगाहों मे धुल-धूमिल है ,,,,,,,,,,
प्राण पखेरू कब उड़ जाए जहनो-जिया मे बड़ी हलचल है ,,,,,,,,
साँसों को साँसों से लगता जैसे ट्रेफिक जाम की दखल है,,,,,,,,,
चहरे पे डर-खौफ,भय-भ्रम और कंगालों-सी शकल है ,,,,,,,,
कहे दादुर दीनहीन अब मौत ही मेरी बस मंजिल है,,,,,,,,,




Saturday, 21 April 2012

महज चेचिस पर ही झुर्रियों ने ली अंगड़ाई है


महज चेचिस पर ही झुर्रियों ने ली अंगड़ाई है
महज हाड़-मांस में ही कल-पुर्जों की हुई घिसाई है
बाखुदा मोहब्बत तो आज भी कतरे-कतरे में उफान पर है
इस नामुराद जमाने ने हम पे बुड़ापे की सिल लगाईं है
यूँ तो तज़ुर्बा जवानी का बेशुमार रहा इस ख़ादिम को
यूँ तो हुस्न की अनारकलियों ने दिलो-जान से चाहा इस सलीम को
लेकिन अब इन बदनों की हवस से दिलों की हुई रुसवाई है
हम अपने इश्क की मिसाल क्या दे तुमको ऐ जहां वालों
हम अपने हुनर को कैसे सोंप दे तुमको ऐ जहां वालों
डूबकर किया है इश्क ये मुलाक़ात उसी की सच्चाई है !

महज चेचिस पर ही झुर्रियों ने ली अंगड़ाई है


महज चेचिस पर ही झुर्रियों ने ली अंगड़ाई है
महज हाड़-मांस में ही कल-पुर्जों की हुई घिसाई है
बाखुदा मोहब्बत तो आज भी कतरे-कतरे में उफान पर है
इस नामुराद जमाने ने हम पे बुड़ापे की सिल लगाईं है
यूँ तो तज़ुर्बा जवानी का बेशुमार रहा इस ख़ादिम को
यूँ तो हुस्न की अनारकलियों ने दिलो-जान से चाहा इस सलीम को
लेकिन अब इन बदनों की हवस से दिलों की हुई रुसवाई है
हम अपने इश्क की मिसाल क्या दे तुमको ऐ जहां वालों
हम अपने हुनर को कैसे सोंप दे तुमको ऐ जहां वालों
डूबकर किया है इश्क ये मुलाक़ात उसी की सच्चाई है !

बूढ़ी मोहब्बत


महज चेचिस पर ही झुर्रियों ने ली अंगड़ाई है,,,,,,,
महज हाड़-मांस में ही कल-पुर्जों की हुई घिसाई है ,,,,,,,
बाखुदा मोहब्बत तो आज भी कतरे-कतरे में उफान पर है ,,,,,,,,
इस नामुराद जमाने ने हम पे बुड़ापे की सिल लगाईं है,,,,,,,
यूँ तो तज़ुर्बा जवानी का बेशुमार रहा इस ख़ादिम को,,,,,,
यूँ तो हुस्न की अनारकलियों ने दिलो-जान से चाहा इस सलीम को ,,,,,,,
लेकिन अब इन बदनों की हवस से दिलों की हुई रुसवाई है ,,,,,,,
हम अपने इश्क की मिसाल क्या दे तुमको ऐ जहां वालों,,,,,,,
हम अपने हुनर को कैसे सोंप दे तुमको ऐ जहां वालों ,,,,,,,,
डूबकर किया है इश्क ये मुलाक़ात उसी की सच्चाई है ,,अरुण "अज्ञात"

बूढ़ी मोहब्बत


महज चेचिस पर ही झुर्रियों ने ली अंगड़ाई है,,,,,,,
महज हाड़-मांस में ही कल-पुर्जों की हुई घिसाई है ,,,,,,,
बाखुदा मोहब्बत तो आज भी कतरे-कतरे में उफान पर है ,,,,,,,,
इस नामुराद जमाने ने हम पे बुड़ापे की सिल लगाईं है,,,,,,,
यूँ तो तज़ुर्बा जवानी का बेशुमार रहा इस ख़ादिम को,,,,,,
यूँ तो हुस्न की अनारकलियों ने दिलो-जान से चाहा इस सलीम को ,,,,,,,
लेकिन अब इन बदनों की हवस से दिलों की हुई रुसवाई है ,,,,,,,
हम अपने इश्क की मिसाल क्या दे तुमको ऐ जहां वालों,,,,,,,
हम अपने हुनर को कैसे सोंप दे तुमको ऐ जहां वालों ,,,,,,,,
डूबकर किया है इश्क ये मुलाक़ात उसी की सच्चाई है ,,अरुण "अज्ञात"

बूढ़ी मोहब्बत


महज चेचिस पर ही झुर्रियों ने ली अंगड़ाई है,,,,,,,
महज हाड़-मांस में ही कल-पुर्जों की हुई घिसाई है ,,,,,,,
बाखुदा मोहब्बत तो आज भी कतरे-कतरे में उफान पर है ,,,,,,,,
इस नामुराद जमाने ने हम पे बुड़ापे की सिल लगाईं है,,,,,,,
यूँ तो तज़ुर्बा जवानी का बेशुमार रहा इस ख़ादिम को,,,,,,
यूँ तो हुस्न की अनारकलियों ने दिलो-जान से चाहा इस सलीम को ,,,,,,,
लेकिन अब इन बदनों की हवस से दिलों की हुई रुसवाई है ,,,,,,,
हम अपने इश्क की मिसाल क्या दे तुमको ऐ जहां वालों,,,,,,,
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डूबकर किया है इश्क ये मुलाक़ात उसी की सच्चाई है ,,अरुण "अज्ञात"

Tuesday, 17 April 2012

सोचने का अंदाज़ बदलो,बस


सोचने का अंदाज़ बदलो
दुनिया बदल जायेगी
शुलों को गुलों में बदलते चलो
मंजिल खुद दोड़ी चली आएगी
दुश्मन को भी दोस्त बनाते चलो
दोस्ती की मिसाल बड़ जायेगी
सोचने का अंदाज़ बदलो
दुनिया बदल जायेगी
लहरों से दिल लगाते चलो
समंदर से पहचान बड़ जायेगी
आसमानों में ख़ुशी के दीप जलाते चलो
अंधेरों की घटा छट जायेगी
सोचने का अंदाज़ बदलो
दुनिया बदल जायेगी
गुरुओं की शरण में समाते चलो
ज्ञान की गंगा बड़ जायेगी
माँ-बाप की सेवा करते चलो
जन्नत नसीबों में छा जायेगी
सोचने का अंदाज़ बदलो
दुनिया बदल जायेगी
बच्चों पे प्रेम लुटाते चलो
खुदा से रूबरू रूह हो जायेगी
दिन-दुखियों का दर्द मिटाते चलो
दुवाओं से झोली भर जायेगी
सोचने का अंदाज़ बदलो
दुनिया बदल जायेगी
मीठा गीत कोई गाते चलो
गले की खराश मिट जायेगी
हर इम्तहान में आत्मविश्वास जगाते चलो
मेहनत जरुर रंग लाएगी
सोचने का अंदाज़ बदलो
दुनिया बदल जायेगी
निगाहों में ख्वाब कोई सजाते चलो
सुबह से मिलने हकीकत बेशक आएगी
हर पल एक हाथ नया मिलाते चलो
सारी कायनात आघोष में सिमट आएगी
सोचने का अंदाज़ बदलो
दुनिया बदल जायेगी !


सोचने का अंदाज़ बदलो,बस


सोचने का अंदाज़ बदलो
दुनिया बदल जायेगी
शुलों को गुलों में बदलते चलो
मंजिल खुद दोड़ी चली आएगी
दुश्मन को भी दोस्त बनाते चलो
दोस्ती की मिसाल बड़ जायेगी
सोचने का अंदाज़ बदलो
दुनिया बदल जायेगी
लहरों से दिल लगाते चलो
समंदर से पहचान बड़ जायेगी
आसमानों में ख़ुशी के दीप जलाते चलो
अंधेरों की घटा छट जायेगी
सोचने का अंदाज़ बदलो
दुनिया बदल जायेगी
गुरुओं की शरण में समाते चलो
ज्ञान की गंगा बड़ जायेगी
माँ-बाप की सेवा करते चलो
जन्नत नसीबों में छा जायेगी
सोचने का अंदाज़ बदलो
दुनिया बदल जायेगी
बच्चों पे प्रेम लुटाते चलो
खुदा से रूबरू रूह हो जायेगी
दिन-दुखियों का दर्द मिटाते चलो
दुवाओं से झोली भर जायेगी
सोचने का अंदाज़ बदलो
दुनिया बदल जायेगी
मीठा गीत कोई गाते चलो
गले की खराश मिट जायेगी
हर इम्तहान में आत्मविश्वास जगाते चलो
मेहनत जरुर रंग लाएगी
सोचने का अंदाज़ बदलो
दुनिया बदल जायेगी
निगाहों में ख्वाब कोई सजाते चलो
सुबह से मिलने हकीकत बेशक आएगी
हर पल एक हाथ नया मिलाते चलो
सारी कायनात आघोष में सिमट आएगी
सोचने का अंदाज़ बदलो
दुनिया बदल जायेगी !


सोचने का अंदाज़ बदलो,,,,

सोचने का अंदाज़ बदलो,,,,
दुनिया बदल जायेगी,,,,,
शुलों को गुलों में बदलते चलो ,,,,,,
मंजिल खुद दोड़ी चली आएगी ,,,,,,
दुश्मन को भी दोस्त बनाते चलो ,,,,,
दोस्ती की मिसाल बड़ जायेगी .,,,,,
सोचने का अंदाज़ बदलो,,,,
दुनिया बदल जायेगी,,,,,|
लहरों से दिल लगाते चलो ,,,
समंदर से पहचान बड़ जायेगी,,,,
आसमानों में ख़ुशी के दीप जलाते चलो ,,,,,,,
अंधेरों की घटा छट जायेगी ,,,,,,,
सोचने का अंदाज़ बदलो,,,,
दुनिया बदल जायेगी,,,,,|
गुरुओं की शरण में समाते चलो,,,,,,
ज्ञान की गंगा बड़ जायेगी,,,,,,,
माँ-बाप की सेवा करते चलो,,,,,,,,,
जन्नत नसीबों में छा जायेगी,,,,,,,,,
सोचने का अंदाज़ बदलो,,,,
दुनिया बदल जायेगी,,,,,|
बच्चों पे प्रेम लुटाते चलो,,,,,,,,
खुदा से रूबरू रूह हो जायेगी,,,,,,,
दिन-दुखियों का दर्द मिटाते चलो,,,,,,
दुवाओं से झोली भर जायेगी,,,,,,,,
सोचने का अंदाज़ बदलो,,,,
दुनिया बदल जायेगी,,,,,|
मीठा गीत कोई गाते चलो,,,,,,
गले की खराश मिट जायेगी,,,,,,,,
हर इम्तहान में आत्मविश्वास जगाते चलो ,,,,,,
मेहनत जरुर रंग लाएगी ,,,,,,
सोचने का अंदाज़ बदलो,,,,
दुनिया बदल जायेगी,,,,,|
निगाहों में ख्वाब कोई सजाते चलो ,,,,,,,
सुबह से मिलने हकीकत बेशक आएगी ,,,,,,,,
हर पल एक हाथ नया मिलाते चलो,,,,,
सारी कायनात आघोष में सिमट आएगी,,,,,,,
सोचने का अंदाज़ बदलो,,,,
दुनिया बदल जायेगी,,,,अरुण "अज्ञात"


सोचने का अंदाज़ बदलो,,,,

सोचने का अंदाज़ बदलो,,,,
दुनिया बदल जायेगी,,,,,
शुलों को गुलों में बदलते चलो ,,,,,,
मंजिल खुद दोड़ी चली आएगी ,,,,,,
दुश्मन को भी दोस्त बनाते चलो ,,,,,
दोस्ती की मिसाल बड़ जायेगी .,,,,,
सोचने का अंदाज़ बदलो,,,,
दुनिया बदल जायेगी,,,,,|
लहरों से दिल लगाते चलो ,,,
समंदर से पहचान बड़ जायेगी,,,,
आसमानों में ख़ुशी के दीप जलाते चलो ,,,,,,,
अंधेरों की घटा छट जायेगी ,,,,,,,
सोचने का अंदाज़ बदलो,,,,
दुनिया बदल जायेगी,,,,,|
गुरुओं की शरण में समाते चलो,,,,,,
ज्ञान की गंगा बड़ जायेगी,,,,,,,
माँ-बाप की सेवा करते चलो,,,,,,,,,
जन्नत नसीबों में छा जायेगी,,,,,,,,,
सोचने का अंदाज़ बदलो,,,,
दुनिया बदल जायेगी,,,,,|
बच्चों पे प्रेम लुटाते चलो,,,,,,,,
खुदा से रूबरू रूह हो जायेगी,,,,,,,
दिन-दुखियों का दर्द मिटाते चलो,,,,,,
दुवाओं से झोली भर जायेगी,,,,,,,,
सोचने का अंदाज़ बदलो,,,,
दुनिया बदल जायेगी,,,,,|
मीठा गीत कोई गाते चलो,,,,,,
गले की खराश मिट जायेगी,,,,,,,,
हर इम्तहान में आत्मविश्वास जगाते चलो ,,,,,,
मेहनत जरुर रंग लाएगी ,,,,,,
सोचने का अंदाज़ बदलो,,,,
दुनिया बदल जायेगी,,,,,|
निगाहों में ख्वाब कोई सजाते चलो ,,,,,,,
सुबह से मिलने हकीकत बेशक आएगी ,,,,,,,,
हर पल एक हाथ नया मिलाते चलो,,,,,
सारी कायनात आघोष में सिमट आएगी,,,,,,,
सोचने का अंदाज़ बदलो,,,,
दुनिया बदल जायेगी,,,,अरुण "अज्ञात"


सोचने का अंदाज़ बदलो,,,,

सोचने का अंदाज़ बदलो,,,,
दुनिया बदल जायेगी,,,,,
शुलों को गुलों में बदलते चलो ,,,,,,
मंजिल खुद दोड़ी चली आएगी ,,,,,,
दुश्मन को भी दोस्त बनाते चलो ,,,,,
दोस्ती की मिसाल बड़ जायेगी .,,,,,
सोचने का अंदाज़ बदलो,,,,
दुनिया बदल जायेगी,,,,,|
लहरों से दिल लगाते चलो ,,,
समंदर से पहचान बड़ जायेगी,,,,
आसमानों में ख़ुशी के दीप जलाते चलो ,,,,,,,
अंधेरों की घटा छट जायेगी ,,,,,,,
सोचने का अंदाज़ बदलो,,,,
दुनिया बदल जायेगी,,,,,|
गुरुओं की शरण में समाते चलो,,,,,,
ज्ञान की गंगा बड़ जायेगी,,,,,,,
माँ-बाप की सेवा करते चलो,,,,,,,,,
जन्नत नसीबों में छा जायेगी,,,,,,,,,
सोचने का अंदाज़ बदलो,,,,
दुनिया बदल जायेगी,,,,,|
बच्चों पे प्रेम लुटाते चलो,,,,,,,,
खुदा से रूबरू रूह हो जायेगी,,,,,,,
दिन-दुखियों का दर्द मिटाते चलो,,,,,,
दुवाओं से झोली भर जायेगी,,,,,,,,
सोचने का अंदाज़ बदलो,,,,
दुनिया बदल जायेगी,,,,,|
मीठा गीत कोई गाते चलो,,,,,,
गले की खराश मिट जायेगी,,,,,,,,
हर इम्तहान में आत्मविश्वास जगाते चलो ,,,,,,
मेहनत जरुर रंग लाएगी ,,,,,,
सोचने का अंदाज़ बदलो,,,,
दुनिया बदल जायेगी,,,,,|
निगाहों में ख्वाब कोई सजाते चलो ,,,,,,,
सुबह से मिलने हकीकत बेशक आएगी ,,,,,,,,
हर पल एक हाथ नया मिलाते चलो,,,,,
सारी कायनात आघोष में सिमट आएगी,,,,,,,
सोचने का अंदाज़ बदलो,,,,
दुनिया बदल जायेगी,,,,अरुण "अज्ञात"


Sunday, 15 April 2012

कश्ती

समंद्दर है गहरा,साहिलों पे है पहरा

लहरों से अल्फाज़े शिकायत क्या करें

जब कश्ती ने बिच भंवर में साथ छोड़ दिया मेरा ,,,,,,अरुण "अज्ञात"

कश्ती

समंद्दर है गहरा,साहिलों पे है पहरा

लहरों से अल्फाज़े शिकायत क्या करें

जब कश्ती ने बिच भंवर में साथ छोड़ दिया मेरा ,,,,,,अरुण "अज्ञात"

कश्ती

समंद्दर है गहरा,साहिलों पे है पहरा

लहरों से अल्फाज़े शिकायत क्या करें

जब कश्ती ने बिच भंवर में साथ छोड़ दिया मेरा ,,,,,,अरुण "अज्ञात"

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Saturday, 14 April 2012

दर्द का बाज़ार है,ज़ख्मो का व्यापार है



दर्द का बाज़ार है ,ज़ख्मो का व्यापार है
बहते खून पसीने का मोल क्या यहाँ ?
शराबों में डूबा हुआ गुले गुलजार है |
रखैलों ने इज्जत का जिम्मा उठाया है देखो
भरी महफिलों में तन-बदन लुटाया है देखो|
धर्मो की धज्जियां उड़ा रहे है पाखंडी
और रंडी के मजे ले रहे है शाणे शिखंडी
गरीबों को ना मिरिंडा मिल रहा है ना हंडी
और बड़े भाव खा रही है भारतीय मण्डी
लावारिस,लावारिस ही भटक रहा है
देश का संविधान जाने कहाँ लटक रहा है
खुलेआम आतंकवाद की हो रही अय्याशी है
और भ्रस्टाचारी हाथों-हाथ हेरा फेरी गटक रहा है |
बस्ती-बस्ती,हस्ती-हस्ती यही नोटंकी यही नाटक है
ना खिड़की ना दरवाजा और ना कोई फाटक है
अपराधियों की चौपालों पे चल रही बैठक है |
घर का भेदी लंका ढहा रहा है
ना सोने का हार ना फांसी का फंदा समझ आ रहा है
छाछ मक्खन पडोसी का कुत्ता खा रहा है
घर का उल्लू बाहर ताक झाँक रहा है |
विषयों में वीकट घिरा हुआ है युवा
महिलाओं पे दिन दहाड़े हो रहा धावा
जानते हुए भी अनजान बनते है वो
जो चाट चाटकर खा रहे है मलाई मावा !
          













दर्द का बाज़ार है,ज़ख्मो का व्यापार है



दर्द का बाज़ार है ,ज़ख्मो का व्यापार है
बहते खून पसीने का मोल क्या यहाँ ?
शराबों में डूबा हुआ गुले गुलजार है |
रखैलों ने इज्जत का जिम्मा उठाया है देखो
भरी महफिलों में तन-बदन लुटाया है देखो|
धर्मो की धज्जियां उड़ा रहे है पाखंडी
और रंडी के मजे ले रहे है शाणे शिखंडी
गरीबों को ना मिरिंडा मिल रहा है ना हंडी
और बड़े भाव खा रही है भारतीय मण्डी
लावारिस,लावारिस ही भटक रहा है
देश का संविधान जाने कहाँ लटक रहा है
खुलेआम आतंकवाद की हो रही अय्याशी है
और भ्रस्टाचारी हाथों-हाथ हेरा फेरी गटक रहा है |
बस्ती-बस्ती,हस्ती-हस्ती यही नोटंकी यही नाटक है
ना खिड़की ना दरवाजा और ना कोई फाटक है
अपराधियों की चौपालों पे चल रही बैठक है |
घर का भेदी लंका ढहा रहा है
ना सोने का हार ना फांसी का फंदा समझ आ रहा है
छाछ मक्खन पडोसी का कुत्ता खा रहा है
घर का उल्लू बाहर ताक झाँक रहा है |
विषयों में वीकट घिरा हुआ है युवा
महिलाओं पे दिन दहाड़े हो रहा धावा
जानते हुए भी अनजान बनते है वो
जो चाट चाटकर खा रहे है मलाई मावा !
          













दर्द का बाज़ार है


दर्द का बाज़ार है ,ज़ख्मो का व्यापार है
बहते खून पसीने का मोल क्या यहाँ ?
शराबों में डूबा हुआ गुले गुलजार है |
रखैलों ने इज्जत का जिम्मा उठाया है देखो
भरी महफिलों में तन-बदन लुटाया है देखो|
धर्मो की धज्जियां उड़ा रहे है पाखंडी
और रंडी के मजे ले रहे है शाणे शिखंडी
गरीबों को ना मिरिंडा मिल रहा है ना हंडी
और बड़े भाव खा रही है भारतीय मण्डी
लावारिस,लावारिस ही भटक रहा है
देश का संविधान जाने कहाँ लटक रहा है
खुलेआम आतंकवाद की हो रही अय्याशी है
और भ्रस्टाचारी हाथों-हाथ हेरा फेरी गटक रहा है |
बस्ती-बस्ती,हस्ती-हस्ती यही नोटंकी यही नाटक है
ना खिड़की ना दरवाजा और ना कोई फाटक है
अपराधियों की चौपालों पे चल रही बैठक है |
घर का भेदी लंका ढहा रहा है
ना सोने का हार ना फांसी का फंदा समझ आ रहा है
छाछ मक्खन पडोसी का कुत्ता खा रहा है
घर का उल्लू बाहर ताक झाँक रहा है |
विषयों में वीकट घिरा हुआ है युवा
महिलाओं पे दिन दहाड़े हो रहा धावा
जानते हुए भी अनजान बनते है वो
जो चाट चाटकर खा रहे है मलाई मावा
              {अरुण "अज्ञात"}













दर्द का बाज़ार है


दर्द का बाज़ार है ,ज़ख्मो का व्यापार है
बहते खून पसीने का मोल क्या यहाँ ?
शराबों में डूबा हुआ गुले गुलजार है |
रखैलों ने इज्जत का जिम्मा उठाया है देखो
भरी महफिलों में तन-बदन लुटाया है देखो|
धर्मो की धज्जियां उड़ा रहे है पाखंडी
और रंडी के मजे ले रहे है शाणे शिखंडी
गरीबों को ना मिरिंडा मिल रहा है ना हंडी
और बड़े भाव खा रही है भारतीय मण्डी
लावारिस,लावारिस ही भटक रहा है
देश का संविधान जाने कहाँ लटक रहा है
खुलेआम आतंकवाद की हो रही अय्याशी है
और भ्रस्टाचारी हाथों-हाथ हेरा फेरी गटक रहा है |
बस्ती-बस्ती,हस्ती-हस्ती यही नोटंकी यही नाटक है
ना खिड़की ना दरवाजा और ना कोई फाटक है
अपराधियों की चौपालों पे चल रही बैठक है |
घर का भेदी लंका ढहा रहा है
ना सोने का हार ना फांसी का फंदा समझ आ रहा है
छाछ मक्खन पडोसी का कुत्ता खा रहा है
घर का उल्लू बाहर ताक झाँक रहा है |
विषयों में वीकट घिरा हुआ है युवा
महिलाओं पे दिन दहाड़े हो रहा धावा
जानते हुए भी अनजान बनते है वो
जो चाट चाटकर खा रहे है मलाई मावा
              {अरुण "अज्ञात"}













दर्द का बाज़ार है


दर्द का बाज़ार है ,ज़ख्मो का व्यापार है
बहते खून पसीने का मोल क्या यहाँ ?
शराबों में डूबा हुआ गुले गुलजार है |
रखैलों ने इज्जत का जिम्मा उठाया है देखो
भरी महफिलों में तन-बदन लुटाया है देखो|
धर्मो की धज्जियां उड़ा रहे है पाखंडी
और रंडी के मजे ले रहे है शाणे शिखंडी
गरीबों को ना मिरिंडा मिल रहा है ना हंडी
और बड़े भाव खा रही है भारतीय मण्डी
लावारिस,लावारिस ही भटक रहा है
देश का संविधान जाने कहाँ लटक रहा है
खुलेआम आतंकवाद की हो रही अय्याशी है
और भ्रस्टाचारी हाथों-हाथ हेरा फेरी गटक रहा है |
बस्ती-बस्ती,हस्ती-हस्ती यही नोटंकी यही नाटक है
ना खिड़की ना दरवाजा और ना कोई फाटक है
अपराधियों की चौपालों पे चल रही बैठक है |
घर का भेदी लंका ढहा रहा है
ना सोने का हार ना फांसी का फंदा समझ आ रहा है
छाछ मक्खन पडोसी का कुत्ता खा रहा है
घर का उल्लू बाहर ताक झाँक रहा है |
विषयों में वीकट घिरा हुआ है युवा
महिलाओं पे दिन दहाड़े हो रहा धावा
जानते हुए भी अनजान बनते है वो
जो चाट चाटकर खा रहे है मलाई मावा
              {अरुण "अज्ञात"}